कोरोना का गुड इफेक्ट : ओडिशा तट अंडे देने पहुंचे 8 लाख कछुए

भुवनेश्वर। कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरों को देखते देश लॉक डाउन  है। जल, थल और नभ तीनों थम से गए हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण सुधार के रुप में सामने आ रहा है। दिल्ली हो या रायपुर या भुवनेश्वर सभी जगह प्रदूषण का स्तर काफी कम हुआ है।

इधर ओडिशा से भी अच्छी खबर है कि जल यानि समुद्री जीवन में भी बदलाव देखा जा रहा है। प्रदूषण का स्तर यहां भी काफी कम हो गया है। इसका सीधा असर ओलिव रिडले कछुओं पर पड़ा है। ओडिशा के तट पर इस बार सात लाख नब्बे हजार ओलिव रिडले कछुए पहुंचे हैं।

प्रदूषण के अलावा कभी नाव, बोट से जान या फिर बदन  का कुछ हिस्सा गंवाने वाले ये कछुए इस बार निर्बाध पहुंच गए हैं। मानव शिकारियों के हाथों जान गंवाना भी नहीं पड़ रहा है। पर्यटकों की आवाजाही न होने के कारण ये इनसे होने वाले प्रभाव से भी मुक्त हैं।एक तरह से इन्होंने मानो युद्ध मानो जीत लिया है। अपने समुद्र में काबिज हो गए हैं।

24 मार्च से  पर्यटकों को रशिकुल्या जाने से रोक दिया गया है, लेकिन शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों को इन स्थलों पर जाने की इजाजत है।

मिली जानकारी के अनुसार इन कछुओं ने गहिरमाथा और रूसीकुल्य में छह करोड़ से ज्यादा अंडे दिए हैं। यह आंकड़ा करीब 5 दिनों का है।

एक अंग्रेजी दैनिक की रिपोर्ट के मुताबिक बकौल ब्रह्मपुर डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर अमलान नायक- 22 मार्च को लगभग 2 बजे, 2,000 फीमेल ओलिव रिडलिस समुद्र से समुद्र तट से अचानक बाहर निकलने लगीं। माना जाता है कि मादा कछुए उसी समुद्र तट पर वापस लौटती हैं जहां उन्होंने अंडे दिए थे। इस लिहाज से ओडिशा का तट उनके लिए सबसे बड़ा सामूहिक घोंसला बनाने वाली जगह है।

सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय और यहां विकासपरक मुद्दों पर लिखने वाले यहां के पत्रकार वासुदेव महापात्र कहते हैं, दरअसल इंसानी दखल की गैरमौजूदगी ने इन्हें निर्बाध कर दिया है।सामान्य दिनों में इंसानी गतिविधियों से कई रास्ते में ही मौत के शिकार हो जाते थे तो कई बार कई तरह की बाधाएं मौसम की प्रतिकूलताएं इन्हें यहां पहुंचने नहीं देती थीं।

यहां जंगली जानवरों और कुत्तों के शिकार से बचाने के लिए इन्हें स्थानीय लोगों , स्वयंसेवी संगठन के  अलावा वन विभाग भी मुस्तैद है। जिससे इस बार ये ज्यादा सुरक्षित रह रहे हैं।

बता दें कि हर साल बंगाल की खाड़ी से ओलिव रिडली प्रजाति के समुद्री मादा कछुए अंडा देने यहां आया करती हैं।

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प्रकाशित
Labanya Masant

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