नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मुस्लिम संगठन

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की तरफ से कपिल सिब्बल करेंगे ज़िरह

नई दिल्ली। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक को राज्यसभा में पारित करने के बाद आज सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई है। IUML द्वारा दायर रिट याचिका में ये तर्क है कि विधेयक अवैध रूप से लोगों को धर्म के आधार पर वर्गीकृत करता है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ता की तरफ से कोर्ट में उनका पक्ष रखेंगे।
इधर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी नागरिकता (संशोधन) विधेयक संविधान की मूल संरचना के खिलाफ बताया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी कहा था कि यह सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून को चुनौती दी जाएगी। आज राज्यसभा द्वारा नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित किए जाने के कुछ ही मिनटों बाद इसकी प्रतिक्रिया आई। यह विधेयक सोमवार को लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया। राज्यसभा और लोकसभा में विधेयक के पारित होने को “त्रासदी” करार देते हुए जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि “विधेयक भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है और जमीयत इसे शीर्ष अदालत में चुनौती देगा। मदनी ने कहा कि जमीयत इसे अदालत में चुनौती देगा क्योंकि विधायिका ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया है। उन्होंने एक बयान में कहा- अब न्यायपालिका इस पर बेहतर निर्णय ले सकती है। अधिवक्ताओं से इस संबंध में सलाह ली गई है और एक याचिका का मसौदा तैयार किया जा रहा है।”

मदनी ने यह भी कहा कि लोकसभा द्वारा विधेयक पारित किए जाने के बाद, जमीयत ने अपने स्तर पर पूरी कोशिश की कि राज्यसभा में इस विधेयक के हानिकारक प्रभाव के बारे में उन्हें समझाने के लिए विभिन्न दलों के सदस्यों से संपर्क करके कानून पारित न किया जाए। उन्होंने कहा “कथित तौर पर कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने अपने गैरजिम्मेदार व्यवहार को दिखाया, और विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया है।”

इंसान और नागरिकों के मौलिक अधिकार का मामला
मदनी ने यह भी कहा कि विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि देश में किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा और प्रत्येक नागरिक के साथ समान व्यवहार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह बिल देश की सुरक्षा और सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। मदनी ने कहा कि इस विधेयक के प्रभाव अब दिखाई नहीं दे सकते हैं, लेकिन जब पूरे देश में एनआरसी का आयोजन किया जाता है, तो कानून लाखों मुसलमानों को बुरी तरह प्रभावित करेगा। “यह हिंदू-मुस्लिम मामला नहीं है, यह इंसान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का मामला है।”