Rath Yatra : 108 घड़ो के जल से स्वामी जगन्नाथ का स्नान

देशभर में मनाई जा रही है स्नान पूर्णिमा

पूरी। महाप्रभु जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा का शुभारंभ आज से हो चुका है। श्री मंदिर से महाप्रभु जगन्नाथ आज स्नान मंडप तक पहुंचकर स्नान कर रहे है। जिसके बाद अधिक स्नान करने की वजह से महाप्रभु की तबीयत बिगड़ेगी और अगले 15 दिन के लिए महाप्रभु एकांतवास पर आराम करेंगे। ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर में महाप्रभु जगन्नाथ का स्नान कराया जा रहा है। महाप्रभु जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का भी स्नान होता है। आज के दिन को देवस्थान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा पर पड़ता है।

            महाप्रभु जगन्नाथ श्री मंदिर से स्नान मंडप के परिसर में सुना कुआं ( सोने का कुआं) से साल भर में एक बार स्नान करते हैं। जहां उन्हें इस कुएं से 108 घड़ों में पानी निकाल कर पवित्र स्नान कराया जाता है। अल सुबह से शुरू होने वाली इस प्रक्रिया में सबसे पहले स्नान मंडप में 108 घड़ों से कुएं से पानी निकाल कर सभी घड़ों को मंडप में रखा जाता है। जिसमें मंदिर के पुजारी इन जलों में हल्दी, जओ, अक्षत, चंदन, पुष्प और गंगाजल समित सुगंधित इत्र डालकर इसे पवित्र करते हैं। इसके बाद इन घड़ों को स्नान मंडप में लाकर विधि विधान से महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और सुभद्रा का स्नान कराते हैं। निरंतर मंत्रोच्चार के साथ महाप्रभु जगन्नाथ का जलाभिषेक संपन्न होता है, उसके बाद भगवान का पूर्ण रूप से श्रृंगार कर दर्शन कराया जाता है।

स्नान पूर्णिमा को भक्तों द्वारा अधिक स्नान कराए जाने के बाद महाप्रभु जगन्नाथ बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की तबीयत बिगड़ जाती हैं। जिसके बाद महाप्रभु को अगले 15 दिनों के लिए एकांतवास में रखा जाता है। जहां उनका काढ़ा और औषधियों से उपचार किया जाता है।

           15 दिनों के आराम के बाद महाप्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर सवार होकर निकलते हैं। जिसे विश्वभर में रथयात्रा के नाम से जाना जाता है। साल 2019 की रथ यात्रा 4 जुलाई को निकलेगी, इससे एक दिन पहले यानी 3 जुलाई को भगवान का अंतिम सिंगार कर नेत्रोत्सव संपन्न होगा।

राजा इंद्रद्युम्न ने की थी पहली व्यवस्था
भगवान जगन्नाथ के भक्तों के बीच यह धारणा है कि यदि वे इस दिन देवता के दर्शन करने के लिए तीर्थयात्रा करते हैं, तो वे अपने सभी पापों से मुक्त हो जाएंगे। इस अवसर पर लाखों भक्त मंदिर आते हैं। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार इस समारोह की व्यवस्था की थी जब देवताओं की मूर्तियों को पहली बार स्थापित किया गया था।