पीओके में उठी नदी, मुजफ्फराबाद को बचाने व पाकिस्तान-चीन से बचाने की आवाज

नदी की धारा मोड़ने को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं

नई दिल्ली | डेढ़ अरब डालर कितने पाकिस्तानी रुपये के बराबर होता है? इसका जवाब भले ही इस्लामाबाद में कई लोगों की आंखें फाड़ दे लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोगों के लिए यह नाममात्र भी नहीं है।

स्थानीय लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि क्षेत्र में अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं या नहीं। सोमवार को हस्ताक्षरित आजाद पट्टन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के लिए 1.54 अरब डालर का निवेश समझौता इस क्षेत्र के लिए उच्च मूल्य वाली परियोजनाओं की कड़ी में ताजा जुड़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) एक ‘गेम चेंजर’ होगा।

जबकि, स्थानीय लोग क्षेत्र में चीनियों की भारी उपस्थिति, बड़े पैमाने पर बांधों के निर्माण और नदी की धारा मोड़ने को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं।

जिस वक्त चीन का जेजाऊबा समूह समझौते पर हस्ताक्षर कर रहा था और इमरान खान राष्ट्रीय टीवी पर घोषणा कर रहे थे कि इस परियोजना से पाकिस्तान को ‘हर तरफ से’ लाभ होगा, हजारों लोग मुजफ्फराबाद की सड़कों पर चीन और यहां तक कि सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुए सड़कों पर निकले।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “यदि आप नीलम-झेलम नदी को मोड़ने की कोशिश करेंगे तो याद रखें कि हमारे कूच की दिशा इस्लामाबाद संसद की ओर होगी।”

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि चीन और पाकिस्तान नदियों पर ‘कब्जा’ कर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन कर रहे हैं और इस पर इनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

‘दरिया बचाओ, मुजफ्फराबाद बचाओ समिति’ द्वारा इस वर्ष की शुरुआत में बुलाए गए एक बेहद ‘सफल संपूर्ण शटर-डाउन हड़ताल’ के हवाले से पाकिस्तान के प्रमुख दैनिक डॉन ने कहा, “कभी गरजती हुई नीलम नदी अब नौसेरी से डोमेल तक एक छोटे से नाले जैसी लगती है जहां यह झेलम नदी में मिल जाती है। मुजफ्फराबाद के निवासी पहले से ही नीलम नदी को मोड़े जाने से विपरीत प्रभावों का सामना कर रहे हैं और अब प्रस्तावित कोहाला परियोजना ने उनकी चिंताओं को और बढ़ा दिया है क्योंकि इसमें झेलम नदी को ऐसी ही सुरंग प्रणाली के माध्यम से मोड़ना प्रस्तावित है।”

प्रदर्शनकारियों के ‘नीलम और झेलम को बहने दो, हमें जीने दो’ के नारों के बीच एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता फैसल जमील ने कोहाला हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट ई-फ्लो मूल्यांकन रिपोर्ट के हवाले से कहा कि झेलम नदी के मोड़े जाने के बाद क्षेत्र की शुष्क दिनों की अवधि में 100 दिनों की वृद्धि होगी।

दरिया बचाओ तहरीक से जुड़े ज्यादातर विशेषज्ञ नए पनबिजली परियोजना समझौते को मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों के लिए ‘शत्रुतापूर्ण’ मानते हैं।

विरोध प्रदर्शनों में शामिल मुजफ्फराबाद स्थित एक ट्रेड यूनियन मरकजी अंजुमन ताजरान के अध्यक्ष शौकत नवाज मीर को थर्ड पोल संगठन ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि समस्या यह है कि ‘हमारी सरकार महज एक कठपुतली सरकार है, यह हमारे अधिकारों के लिए नहीं लड़ सकती है। जब यह पाकिस्तान सरकार से मिलती है तो महज एक हां में हां मिलाने वाले आदमी के रूप में मिलती है।’

हालांकि, गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासियों के लिए यही एकमात्र चिंता का विषय नहीं है। यह इलाका दशकों से पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा किए गए ‘सौतेले व्यवहार’ के कारण गहरे संकट में है।

क्षेत्र के युवा बेहतर कनेक्टिविटी की मांग करते हुए सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और पिछले कुछ महीनों से ऑनलाइन कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं।

पीओके से बलूचिस्तान तक, लगभग हर प्रोजेक्ट चीनियों के हाथ में जाने के साथ ही पाकिस्तान में डॉलर के बंडल आ रहे हैं लेकिन देश में अभी भी अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है।

(यह सामग्री इंडियानैरेटिव डॉट कॉम के साथ एक व्यवस्था के तहत प्रस्तुत की गई)

–आईएएनएस