देश विशेष : काकतीय-चालुक्य शासन संभ्रम तथा मणिकेश्वरी देवी…

नवरात्रि पर विशेष आलेख श्रंखला - दूसरी कड़ी

देश टीवी विशेष। बस्तर (छतीसगढ़) में पले–बढ़े,वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी मे प्रबंधक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर की गहरी संवेदनाओ के साथ पड़ताल की है। कला, संस्कृति, साहित्य, राजनीति से लेकर तमाम सामयिक मुद्दों पर वे लिखते रहते हैं। वे बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों, और विशेषताओं को सामने रखते हैं जो अब तक बहुत कम देखने-सुनने-पढ़ने को मिलती है। चर्चित किताब ‘आमचो बस्तर’ के लेखक राजीव रंजन प्रसाद को उनकी किताब ‘बस्तरनामा’ के लिए भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने अपने प्रतिष्ठित ‘राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार’ से सम्मानित किया है। देश टीवी पोर्टल पर नवरात्रि के नौ दिनों तक उनके आलेखों की श्रृंखला की यह दूसरी कड़ी… – संपादक

यह विमर्श सर्वदा बना रहा है कि क्या बस्तर में देवी दंतेश्वरी का प्रादुर्भाव चालुक्य वंश के संस्थापक अन्नमदेव के वारंगल से इस अंचल में प्रवेश के साथ साथ हुआ है? बस्तर के मध्यकाल का इतिहास यहाँ नागों को पराजित कर अपनी सत्ता स्थापित करने वाले राजवंश के प्रति काकतीय अथवा चालुक्य की चर्चा में उलझा हुआ प्रतीत होता है। इस विषय की जटिलता को समझने के लिये यह जानना आवश्यक है कि

बस्तर पर शासन करने वाले चालुक्य कौन थे तथा उनका वारंगल पर शासन करने वाले काकतीय शासकों से क्या सम्बंध रहा है। इतिहासकार मानते हैं कि वर्ष 1190 के पश्चात कल्याण के चालुक्यों के विखण्डन की परिणति हुई छोटे छोटे साम्राज्यों का उदय। कल्याण के चालुक्यों की मुख्य शाखायें थीं वारंगल के काकतीय, द्वारसमुद्र के होएसल और देवगिरि के यादव। वारंगल के काकतीय शासकों से सीधा सम्बन्ध बस्तर की उस राजनीति का जुड़ता है जो वर्ष 1324 के पश्चात दण्डकारण्य के इस हिस्से में आरम्भ हुई।

                      वारंगल के काकतीय राजा गणपति (1199-1260 ई.) की दो पुत्रियाँ थीं रुद्राम्बा तथा गणपाम्बा। उनके देहावसान के बाद उनकी बड़ी पुत्री रुद्राम्बा ने सत्ता संभाली। चालुक्य राजा वीरभद्रेश्वर से महारानी रुद्राम्बा का विवाह हुआ था। वर्ष 1260 ई. अथवा इससे कुछ पूर्व राजा गणपति ने अपनी पुत्री रुद्राम्बा को सह-शासिका बनाया तत्पश्चात अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। चालुक्य राजा वीरभद्र तथा रानी रुद्राम्बा को कोई पुत्र नहीं था। उनकी दो कन्या संततियाँ रुयम्मा एवं मम्मड़म्बा थी। पुत्री मम्मड़म्बा के दो पुत्र हुए प्रतापरुद्र देव एवं अन्नमदेव। रानी रुद्राम्बा ने अपने दौहित्र प्रतापरुद्र देव को गोद ले कर अपने राज्य का वारिस नियुक्त कर दिया। इस तरह प्रतापरुद्र देव ने काकतीय वंश की ध्वजा को मुसलिम आक्रांताओं द्वारा किये गये पतन तक थामे रखा। राजा प्रतापरुद्र चालुक्य पिता की संतति होने के बाद भी काकतीय कहलाये। अन्नमदेव चूंकि गोद नहीं लिये गये थे और वारंगल का पतन होने के पश्चात वे उत्तर की और पलायन कर गये एवं नागों को परास्त कर अपनी सत्ता कायम की अंत: उन्हें चालुक्य निरूपित किया जाना उचित व्याख्या है।


नाग शासक अनन्य देवी उपासक थे। उपलब्ध साक्ष्य चक्रकोट (प्राचीन बस्तर) के नाग राजा जगदेकभूषण नरसिंहदेव (1218-1224 ई.) को मणिकेश्वरी देवी का अनन्य भक्त बताते है। इतिहासकार हीरालाल (1916:289) लिखते हैं कि बस्तर के नागवंशी राजाओं की कुलदेवी मणिकेश्वरी थीं। बस्तर के अनेको अभिलेखों में नागफण मणि की चर्चा की गयी है अत: यह आधार भी नाग राजाओं के मणिकेश्वरी देवी के उपासक होने की कड़ी की तरह जुड़ता है। इस कड़ी को जोड़ने का कुछ प्रयास डॉ. हीरालाल शुक्ल ने भी लिया है जहाँ अपनी किताब चक्रकोट के छिन्दक नाग (760 ई. से 1324 ई) में वे लिखते हैं कि “मणिकेश्वरी एक तांत्रिक देवी हैं। भैरवयामलमंत्र के अनुसार मणि एक चक्र है, तेज या ज्ञानसन्दोह का उपलक्षक है तथा मणिमण्डप पर विन्ध्यवासिनी देवी बैठती हैं।” वे आगे लिखते हैं कि मणिकेश्वरी विन्ध्यवासिनी देवी का पर्याय हैं। इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि सोमेश्वर प्रथम जैसा नाग शासक चक्रकोट पर पुन: साम्राज्य स्थापित करने में विन्ध्यवासिनी देवी का प्रसाद मानता है – विन्ध्यवासिनीदेविवर प्रसाद के अभिलेखीय सन्दर्भ मिलते हैं।

 

वारंगल के शक्तिशाली काकतीय राजा प्रतापरुद्र की मुसलमान आक्रांताओं से निर्णायक पराजय के पश्चात अन्नमदेव ने नागों को पराजित कर बस्तर में जब अपना शासन स्थापित किया तब उन्होंने स्थापित मान्यताओं को भी प्राश्रय देते हुए अपनी कुलदेवी दंतेश्वरी के लिये स्थान प्रसिद्ध मणिकेश्वरी देवी के स्थान से लग कर ही बड़ी लकीर खींचने की तरह निर्मित किया। संभवत: वे अपनी काकतीय पहचान के स्थान पर एक नये साम्राज्य के संस्थापक के रूप में पहचान बनाना चाहते थे। इसलिये भी उन्होंने वारंगल से जुड़ी काकतीय पहचान के स्थान पर अपने पैतृक चालुक्य वंशावली के साथ जुड़ा रहना पसंद किया होगा और अपनी उपासना मान्यताओं का भी पृथक्कीकरण कर इस बात को अधिक पुष्ट कर लिया होगा।

                  वारंगल की अध्ययन यात्रा के पश्चात मुझे यह तथ्य अधिक प्रभावी लगा कि अन्नमदेव ने अपनी पृथक पहचान निरूपित करने अथवा मुसलमान आक्रांताओं से स्वयं के अस्तितिव को गोपनीय रखने के दृष्टिगत धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं में भी बदलाव स्वीकृत किये होंगे। यह तथ्य इसलिये भी ध्यान देने योग्य है चूंकि काकतीय राजा प्रतापरुद्र भी मणिकेश्वरी देवी की के उपासक माने जाते हैं। बस्तर राज वंशावलि (1853) में एक श्लोक विशेषरूप से ध्यान खींचता है –

नवलत्क्षनुर्धराधिनाथे पृथेवीं शासति काकतीयरूद्रे।
अभवत्परमाग्रहारपीड़ाकुचकुम्भेषु कुरंगलोचनानाम।
प्रतापदुर्ददेवस्य पुरकांचनवत्षणम।
यामात्धमहरत्कालम पुरा वै यज्ञ हेतवे।
प्रतापरुद्रनृपतिस्साक्षाद रुद्रांशसम्भव:।
शिवार्चनपरो भक्तो माणिकीशक्ति सेवित:।

यह श्लोक वस्तुत: वारंगल के राजा प्रतापरुद्र की स्तुति की तरह ही है जो बताता है कि काकतीयों के पास प्रबल सैन्यशक्ति थी जिसमे नौ लाख धनुर्धर थे। वे धनी थे। धर्माचरणी थे। इस श्लोक की अंतिम पंक्ति कहती है कि काकतीय मणिकेश्वरी देवी के अनन्य भक्त थे तथा शिव की उपासना/अर्चना भी करते थे। चालुक्य सत्ता और अलग पहचान की तलाश ने अन्नमदेव को जिस नये परिचय के साथ सर्वाधिक जोड़ा वह थी देवी दंतेश्वरी। धीरे-धीरे राज्य की केंद्रीय सत्ता का निरंतर प्राश्रय पाने के करण दंतेश्वरी देवी की महत्ता में अभिवृद्धि होती रही और वे बस्तर में प्रमुख आराध्य स्वीकार ली गयीं। आज दंतेवाड़ा में समानांतर रूप से देवी मणिकेश्वरी तथा दंतेश्वरी के मंदिर गर्व से प्राचीन इतिहास को जीवित करते हुए स्थापित हैं।

                                                                                         – राजीव रंजन प्रसाद