भगत सिंह का वैचारिक पक्ष आज भी आना बाकी-प्रोफेसर चमनलाल

राजगुरु,सुखदेव और भगत सिंह के शहीदी दिवस 23 मार्च  पर 

 

प्रो. चमनलाल मानते हैं कि भगत सिंह के क्रांतिकारी रूप से आम जनता का लगाव ज्यादा है, इसलिए समाज के सामने भगत सिंह के विचार ज्यादा नहीं आ पाए।

बरस भर पहले भिलाई निवासी वरिष्ठ पत्रकार और वोल्गा से शिवनाथ के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर प्रोफेसर चमनलाल से बात की थी|  आज 23 मार्च को अमर शहीद राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह के शहीदी दिवस पर वही बातचीत

 

भगत सिंह के क्रांतिकारी रूप से आम जनता का लगाव ज्यादा है, इसलिए समाज के सामने भगत सिंह के विचार ज्यादा नहीं आ पाए।उनका क्रांतिकारी स्वरूप हम सब को भाता है। इसलिए समाज में उनके साथ बम-पिस्तौल को ही जोड़ कर देखा जाता है और उनके लेखन पर चर्चा कम होती है।

बचपन में दूसरे बच्चों की तरह शहीद भगत सिंह की तस्वीरें और प्रतिमाएं देखते हुए दिमाग में एक बिम्ब सा बना, जो मुझे बेहद आकर्षित करता था। फिर 20 की उम्र में हिंद पाकेट बुक्स से प्रख्यात क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त लिखित ‘भारत के क्रांतिकारी’ नाम की किताब मंगवाई, जिसने काफी प्रभावित किया।

यहां बताते चलूं कि मन्मथनाथ गुप्त काकोरी कांड में फांसी की सजा से इसलिए बचे क्योंकि तब उनकी उम्र 15 से कम थी। इस किताब में उनके अपने संस्मरण है जिनमें भगत सिंह का कई बार जिक्र आता है। इस किताब ने मेरे दिमाग को झकझोर दिया।

इसी दौरान पता चला कि गदर पार्टी के बड़े नेता बाबा गुरुमुख सिंह ‘देशभक्ता यादां’ नाम का पाक्षिक अखबार जालंधर से निकालते हैं। मैनें उस किताब के हिस्से चमनलाल प्रभाकर नाम से लिख कर वहां भेजना शुरू किया। इससे क्रांतिकारी आंदोलन में मेरी दिलचस्पी बढ़ती गई। साहित्य में रूचि के चलते जल्द ही मैं हिंदी साहित्य का प्राध्यापक हो गया।

क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा रहे प्रो. यशपाल पर पीएचडी करने मैं 1977 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) आया। उनके अपने संस्मरण में भी भगत सिंह का काफी जिक्र आता है।

इस तरह लगाव बढ़ता गया और पीएचडी के बाद मैंने शहीद भगत सिंह के दस्तावेजों पर ध्यान देना शुरू किया। तब पता चला कि भगत सिंह के भांजे बृजमोहन सिंह ने पंजाबी में कुछ दस्तावेज हासिल किए थे। इसके बाद पहली बड़ी कोशिश के तौर पर मैनें कर्मेंदु शिशिर के साथ मिल कर शहीद भगत सिंह के दस्तावेजों का पहला संग्रह निकाला जो 1986 में राजकमल प्रकाशन से निकला और आज भी बेहद लोकप्रिय है।

शोध के बाद केंद्र सरकार तैयार हुई जन्मशताब्दी मनाने

20 साल तक जेएनयू में प्राध्यापक रहते हुए भी शहीद भगत सिंह पर फोकस करते हुए हमारा शोध कार्य चलता रहा। इसके चलते 2004 में पहली बार भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज प्रकाशित किए। इन सारे शोध का नतीजा यह हुआ कि शहीदे आजम की जन्मशताब्दी 2007 में औपचारिक रूप से मनाने केंद्र सरकार तैयार हुई और प्रकाशन विभाग ने भी उन पर किताबें निकाली।

भगत सिंह के विचारों पर भी होनी चाहिए चर्चा

शहीदे आजम के व्यक्तित्व को लेकर सभी बातें करते हैं। उनका क्रांतिकारी स्वरूप हम सब को भाता है। इसलिए समाज में उनके साथ बम-पिस्तौल को ही जोड़ कर देखा जाता है और उनके लेखन पर चर्चा कम होती है। जबकि देखिए, बेहद कम उम्र में शहीदे आजम ने बेहद महत्वपूर्ण लेखन किया है।

उनके लिखे कई लेख और पत्र आज तक मिल रहे हैं। इसलिए भगत सिंह की शौर्य गाथाएं तो अपनी जगह है लेकिन उनका लेखन महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. अम्बेडकर और पेरियार के स्तर का है।

शोधपीठ 13 साल से खाली, अब जाकर स्थापित हुआ अभिलेखागार

भगत सिंह के क्रांतिकारी पक्ष के साथ-साथ उनके वैचारिक-बौद्धिक पक्ष को सामने लाने हमने केंद्र सरकार से 2007 शताब्दी वर्ष में एक चेयर (शोधपीठ) की मांग की थी। केंद्र ने मांग मान भी ली और इसे जेएनयू में स्थापित भी कर दिया लेकिन उसकी विडंबना ये है कि आज 13 साल होने को आए और अब तक इस चेयर पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है।

वहां सिर्फ एक पट्टिका लगी हुई है। हम लोगों ने सिर्फ चेयर ही नहीं बल्कि इसके साथ भगत सिंह अभिलेखागार (आर्काईव) की मांग भी की थी, जहां देश के 1857 से 1947 तक के सभी क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेज व फोटोग्राफ सहित अन्य सामग्री होनी चाहिए।

हमारा प्रस्ताव केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जेएनयू के नाम से मंजूर किया था। हालांकि वहां पहल नहीं हो पाई। इस बीच 23 मार्च 2019 को दिल्ली सरकार ने हमारा प्रस्ताव स्वीकार किया और अब वहां अभिलेखागार स्थापित हो रहा है।

भगत सिंह को दक्षिणपंथ के साथ जोडऩा सरासर बेइमानी

हाल के कुछ सालों में यह चलन ज्यादा बढ़ गया है, जिसमें शहीदे आजम भगत सिंह को दक्षिणपंथ के साथ जोड़ा जाता है। अंग्रेजों से माफी मांग कर छूटने वाले और अंग्रेजों की पेंशन लेने वाले दक्षिणपंथी नेता सावरकर के साथ उनका नाम जोड़ा जा रहा है। पिछले बरस अपने इन्हीं षडय़ंत्रों के चलते इन लोगों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी मे भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ सावरकर की मूर्ति लगा दी थी और विवाद होने के बाद उसे हटाया था।

हकीकत यह है कि जब भगत सिंह को जब फांसी हुई तो देश के हर बड़े नेता ने इस पर विरोध जताया। महात्मा गांधी बोले, अंग्रेज सरकार से अपील की, डॉ. अंबेडकर ने संपादकीय लिखा और नेहरू-पटेल ने भी बोला। लेकिन दूसरी तरफ दक्षिणपंथ के किसी एक नेता ने अपनी जुबान नहीं खोली।

अगर सावरकर या किसी ने एक लफ्ज भी लिखा हो तो मुझे दिखा दें। महात्मा गांधी-जवाहर लाल नेहरू से लेकर तमाम नेताओं ने जेल में जाकर कोशिश की कि भगत सिंह अपनी भूख हड़ताल तोड़ें। इसी भूख हड़ताल में जतिन दास शहीद भी हो गए थे। इस नाजुक वक्त में भी दक्षिणपंथ का एक भी नेता सक्रिय नहीं रहा। हालत तो यह थी कि तब किसी एक धर्म के नहीं बल्कि सभी धर्मों के कट्टरपंथियों ने उनकी भूख हड़ताल और फांसी पर चुप्पी साधे रखी थी।

भगत सिंह को मिथक से बाहर निकालने लगातार करना होगा संघर्ष

बीते 5 दशक से हमारा शोध निरंतर चल रहा है। आज भी हमें कहीं न कहीं से भगत सिंह के लेख मिल जाते हैं। 12 साल पहले हमारे पास भगत सिंह से जुड़े 100 दस्तावेज थे जो अब 130 हो चुके हैं और लगातार मिल रहे हैं। उनके लेखन पर केंद्रित नया संस्करण हाल के दिल्ली पुस्तक मेले में 12 साल बाद चार खंडों में जारी हुआ है। हमारी कोशिश है विभिन्न भाषाओं में हम भगत सिंह का लेखन प्रकाशित करें।

इन्हीं कोशिशों में हिंदी, उर्दू और मराठी संस्करण निकला। हिंदी भी निकला। अंग्रेजी में हार्पर कालिंस ने अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकाला है। भगत सिंह पर वैचारिक लेखन पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी में जारी है। हमारी कोशिश है कि उनके लेखन की व्याख्या करते हुए विचारों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए।

वहीं गदर पार्टी पर भी फोकस करें। इन सबकी आज जरूरत इसलिए है, क्योंकि आज बौद्धिक जगत में सबसे बड़ी चुनौती ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ में फैलाया जा रहा झूठ है। भगत सिंह की वैचारिक मित्रता नेहरू, अंबेडकर और पेरियार के स्तर की थी। इसी विचारधारा पर नए भारत का निर्माण होना चाहिए।

इसकी बनिस्बत भगत सिंह पर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले अधिकार जमाने के मकसद से उनके व्यक्तित्व और विचार को कुछ और रूप दे रहे हैं। इसे दुरूस्त करने वैचारिक स्तर पर हम सबको संघर्ष करना पड़ रहा है। कुल मिला कर हमारा आज का यही संघर्ष है।

छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले का सौभाग्य है कि यहां अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की शहादत के समय साथ रहे क्रांतिकारी सुखदेव राज अंतिम दिनों में यहां रहे। दुर्ग के कुथरेल गांव में उनका स्मृति स्थल है।

आजादी के बाद सुखदेव राज ने विनोबा भावे की प्रेरणा से समाजसेवा का फैसला करने की ठानी थी, जिसके बाद दुर्ग जिले में फैली कुष्ठ रोग की बीमारी के मरीजो की सेवा करने 1963 में वे दुर्ग आये।

वे लगभग 10 वर्ष तक यहाँ कुथरेल में रहे और 1973 में उनका निधन हुआ था। मप्र शासन काल में मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और शहीद भगत सिंह के भाई सरदार कुलतार सिंह की मौजूदगी में क्रांतिकारी सुखदेव राज की प्रतिमा का अनावरण 8 दिसंबर 1976 को हुआ था।

आज सुखदेव राज का स्मृति स्थल उपेक्षित सा पड़ा है। छत्तीसगढ़ सरकार से मेरा निवेदन है कि क्रांतिकारी सुखदेव राज की गरिमा बरकरार रखे। अफसोस है कि क्रांतिकारी सुखदेव राज की गरिमा के अनुरूप प्रतिमा स्थल को इस विकसित नहीं किया गया है।

– मुहम्मद जाकिर हुसैन के  http://www.bhilaise.com से साभार )