मैंने कहा, मेरे इस हाथ में दिलीप कुमार का स्पर्श है : कनक तिवारी

मैंने आदत के खिलाफ पत्नी से हाथ मिलाया था। मैंने कहा, मेरे इस हाथ में दिलीप कुमार का स्पर्श है

उस आकर्षक पुरुष ने मेरा दायां हाथ गर्मजोशी से पकड़ा और कई मिनटों तक नहीं छोड़ा। इतनी देर तक तो उसे अपनी फिल्मों में किसी नायिका का हाथ पकड़े मैंने नहीं देखा था। उसके हाथों में ही उसकी भाषा थी। वह उसके मन को हिन्दुस्तानी में बयान कर रही थी।

-कनक तिवारी

मेरा हाथ तुम्हारे हाथ

दिलीप साहब ने ‘आत्मकथा‘ में लिखा है कि उन्हें राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वे बाद में राज्यसभा के सदस्य बनाए गए। उनकी जुबानी और जीवन कथाओं में भी उनकी ऐसी इच्छा का उल्लेख नहीं मिलता कि वे राज्यसभा में जाना चाहते थे।

विस्मृत हो रही घटनाओं, संस्मरणों और यादों के साथ यह निहत्थापन होता है कि चश्मदीद गवाह या दस्तावेज़ नहीं होने से उन पर कोई भरोसा क्यों करे। ऐसी सच्ची यादों को झूठा होने का खिताब मिल जाना भी बहुत सरल होता है।

किस्सा 1972 का है। विद्याचरण शुक्ल रक्षा उत्पादन मंत्री थे। प्राध्यापकी की नौकरी छोड़कर वकालत शुरू करने के पहले मैं सहसा प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और नवभारत वगैरह का संवाददाता हो गया था।

तब युवा और अभिजात्य आदतों में रचे बसे शुक्ल को छोटे भाई की उम्र के मुझ युवा पत्रकार को दिल्ली दरबार की ठसक दिखाने का अवसर आया। मैं रेसकोर्स की उनकी कोठी में रुका था। उसे बाद में प्रधानमंत्री का आवासीय दफ्तर बना दिया गया है।

इतवार की दोपहर लंच के तीन निमंत्रण मंत्री जी के पास थे। एक महाराष्ट्र के राज्यपाल नवाब अली यावर जंग का, दूसरा केन्द्रीय मंत्री इंद्रकुमार गुजराल का और तीसरा पत्रकार सुदर्शन भाटिया का। उनकी पत्नी मक्के की रोटी और सरसों का साग अपने हाथों से बनाकर खिलाने वाली थीं। शुक्ल ने मुझसे मेजबान चुनने को कहा। अपने बेतुके कपड़ों, हीन भावना और पत्रकारिक मित्र से परिचय पाने की ललक में मैंने मक्के की रोटी और सरसों के साग को चुना।

शुक्ल अपनी स्पोर्ट्स् कार चलाते, जीन्स और टी शर्ट पहने फिल्मी हीरो लगते सामने की सीट पर कुर्ता पाजामा पहने बैठे मुझे ले गए। जैसे साहब और ड्राइवर साथ साथ जाते हैं। गुजराल की कोठी में हमारी कार घुस रही थी। सामने से एक खूबसूरत कार आ रही थी।

मंत्री बुदबुदाए, ‘ये हज़रत उतरेंगे। तुम इन्हें संभालना। मैं गुजराल से माफी मांगकर आता हूं।‘ उस कार की पिछली सीट पर बैठा व्यक्ति ‘शुक्ला साहब, शुक्ला साहब‘ कहता अपनी कार को पलटकर हमारी कार के पीछे दौड़ा आया। उतरते उतरते उसने विद्याचरण शुक्ल को घेरा। मुझे संदर्भ मालूम नहीं था।

शुक्ल ने मुझसे तआरुफ कराया ‘ये मेरे राजनीतिक सचिव हैं। छोटे भाई और बड़े पत्रकार भी। मैं इनकी सलाह से राजनीतिक फैसले करता हूं।‘ हर नेता की तरह शुक्ल ने अपने जीवन में ऐसे हजारों कामचलाऊ झूठ बोले ही होंगे। इस झूठ से लेकिन मेरे लिए सच सपना बनकर झरने लगा।

शुक्ल ने उनका तआरुफ जाहिराना कारणों से मुझसे नहीं कराया।

उस आकर्षक पुरुष ने मेरा दायां हाथ गर्मजोशी से पकड़ा और कई मिनटों तक नहीं छोड़ा। इतनी देर तक तो उसे अपनी फिल्मों में किसी नायिका का हाथ पकड़े मैंने नहीं देखा था। उसके हाथों में ही उसकी भाषा थी। वह उसके मन को हिन्दुस्तानी में बयान कर रही थी।

उसकी आंखों में जुंबिश थी। उसकी आंखें हर फिल्म में इस कदर साफ साफ बोलती रही हैं कि अंधे को भी दिखाई पड़ जाता है। आज ज़रूरी नहीं होने पर भी वह जुबान से भी बोल रहा था कि मैं शुक्ल के मन की थाह लूं। ऐसा आग्रह तो उसने कभी भी किसी फिल्म निर्माता से भी फिल्में पाने के लिए नहीं किया होगा। यह खुद्दार अतिमानव अपने से बीस वर्ष छोटे युवक का हाथ पकड़े खड़ा था। मुझे उनकी राजनीतिक आकांक्षा में रुचि नहीं पैदा हो रही थी।

मेरे लिए वे दिलीप कुमार नहीं, देवदास थे। कितने सौभाग्यशाली वे क्षण थे। मेरा नायक देवदास पारो की ड्योढ़ी पर मर जाने के बाद भी केवल मेरा हाथ पकड़ने के लिए दिल्ली के इस सरकारी बंगले की चौहद्दी के अंदर खड़ा था। मैं देवदास से मुखातिब होता हूं।

दिलीप कुमार को अभिनय कला की उनकी चापलूसी में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं ‘देवदास‘ के कारुणिक संवादों का रटा हुआ कोलाज़ बिखेरता हूं। यही डायलाॅग फिल्म में उनके द्वारा बोले जाने पर चंद्रमुखी, धरमदास, पारो, उनकी मां और चुन्नी बाबू तक की आंखों में आंसू छलछलाए थे। मैं अंदर ही अंदर झुंझलाता हूं। कैसा देवदास है जो दिलीप कुमार बने रहने का अभिनय कर रहा है। ज़मींदार का बेटा होकर ऊंची जाति की गरीब लड़की पारो से प्रेम के कारण इसी ने ऐसी त्रासद मौत पाई। हम जैसे लोग भी जीवन में कुछ पाने के बदले इसके जैसी ही त्रासद मौत पाना चाहते रहे। भले ही हमें कोई पी.सी. बरुआ या बिमल राॅय नहीं मिले। यह चाहे तो हम कम से कम शरत बाबू की कलम की स्याही की एक बूंद तो हमें बना सकता है। कितना निष्ठुर है यह कलाकार! जो पारो की ड्योढी़ पर मरकर दुनिया के नौजवानों को देवदास बनाने के महान कलात्मक अभियान को इन राजनीतिज्ञों के कारण टांय टांय फिस्स कर रहा है।

मैं ‘देवदास‘ के मुकाबले उसकी एक अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध फिल्म की गोद से पनाह मांगता हूं। मैं पूछता हूं, ‘आपको ‘शिकस्त‘ फिल्म में अपना अभिनय कैसा लगा?‘ ‘शिकस्त‘ का नायक भी तो बांग्ला कहानी का ही नायक है। बांग्ला कुमारिकाओं ने काॅलेज के हम दोस्तों को जब जब घास नहीं डाली। तब तब हम दिलीप कुमार में ही अपना नायक ढूंढ़ते रहे।

‘शिकस्त‘ में दिलीप का अभिनय अंगरेज़ी के महान रूमानी कवि कीट्स के मृत्यु-लेख की तरह अमर है। कीट्स ने लिखा है, ‘यहां वह लेटा है, जिसका नाम पानी पर खुदा है।‘ मैं ही शिकस्त हो रहा हूं। मेरे अभिनय का दिलीप कुमार पर कोई असर नहीं हो रहा है। उन्हें आज तो नेताओं के कीड़े ने काट खाया है। नेता अभिनेता को तबाह क्यों कर देते हैं?

पठान के हाथ ने मेरी हथेली को दबोचा। इस स्पर्श ने मनुष्य होने की समझ मुझमें विकसित और विस्तारित कर दी। पठान का कड़ा हाथ ब्राह्मण पुत्र के अपेक्षाकृत मुलायम हाथ को शिकंजे में कस चुका था। इस पठान ने अपनी नायिकाओं के हाथों को भी तो इतनी सख्ती से नहीं पकड़ा होगा। मेरे मुकाबले तो वे बेचारियां कोमलांगी ही रही होंगी। इस कलाकार को भ्रम है कि उसके हाथों में सिफारिश करने का दम है। अरे दम तो उसके पैदा होने में ही है। कभी उसके ये हाथ पांव, यह देह और हमारी यह उपस्थिति भी नहीं रहेगी। तब उसकी गैरहाज़िरी इतिहास और हमारी गुमनामी का पर्याय बनेगी।

अकेले में शुक्ल ने मुझे बताया था कि दिलीप साहब के राज्यसभा में जाने की बात चल रही है। मैंने उस दोपहर दायां हाथ नहीं धोया। सुदर्शन भाटिया के घर बाएं हाथ से खाया। शुक्ल की कोठी पहुंचकर मैंने आदत के खिलाफ पत्नी से हाथ मिलाया था। वह चौंकी। मैंने कहा, मेरे इस हाथ में दिलीप कुमार का स्पर्श है।

( फेसबुक पोस्ट, साभार ) 

(11 दिसंबर 1922 को जन्मे दिलीप कुमार , 11 अक्तूबर 2020 को अपनी शादी के 54 साल पुरे कर चुके हैं दिलीप कुमार और सायरा बानो ने सालगिरह नहीं मनाया क्योकि कोरोनावायरस के चलते दिलीप कुमार ने अपने दो भाइयों को खो दिया)