छत्तीसगढ़ में आयकर का छापा, राजनीतिक फंडिंग का कॉकस – डॉ. लखन चौधरी

आयकर कार्रवाई में हेमचंद यादव विवि के वरिष्ठ प्राध्यापक के विचार

रायपुर | छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों, रसूखों, रसूखदारों, नौकरशाहों, अफसरों और पार्टी संगठनों में भूचाल लाने वाली आयकर विभाग की जांच दल ने अपनी ताबड़तोड़ कार्रवाई को समेटते हुए इस समय के लिए स्थगित कर दिया है लेकिन इसका संदेश राज्य और राज्य के बाहर दूर तक पहुंच गया है, या पहुंचा दिया है। यह कार्रवाई कुछ समय के लिए रुकी है या और जानकारियों के साथ फिर शुरु होगी ? यह कोई नहीं जानता, कोई नहीं कह सकता। इस कार्रवाई में सैकड़ों करोड़ नकदी, सैकड़ों करोड़ के हीरे-जवाहरात, विदेशी मुद्राएं, गोपनीय दस्तावेज एवं डायरियां तथा और भी बहुत कुछ बरामद होने की खबरें हैं। बड़ी राजनीतिक फंडिग की बात भी सामने आ रही है। इससे या इस पर विचार करना या चर्चा करना ना तो मेरा मकसद नहीं है, क्योंकि इसमें जहां कई तरह की राजनीति है वहीं इसके कई तरह के मायने भी हैं।

यहां चर्चा का एकमात्र उद्देश्य यह है कि इस कार्रवाई से एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है या आ रही है वह यह है कि “राजनीतिक फंडिग” का जो कॉकस (caucus) सामने आया है वह नौकरशाही, अफसरशाही और राजनीतिज्ञों का है। यह अपने आप में जहां एक नया विचार है वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भयानक, खतरनाक सोच भी है। अभी तक कारपोरेट, बिजनेस क्लास, मीडिया, माफियाओं, अपराधियों आदि का राजनीतिक व्यवस्था या राजनीतिक दलों या राजनीतिज्ञों के साथ गठजोड़ या सांठगांठ की बात सामने आती रही है लेकिन अब नौकरशाही और अफसरशाही के साथ गठजोड़ से सरकार बनाने और सरकार चलाने की बात की जा रही है या हो रही है। यह बहुत महत्वपूर्ण है, दुर्भाग्यपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ में पिछले तीन दिनों से चल रही आयकर विभाग की कार्यवाही ने राज्य में भूचाल ला दिया है, राज्य के प्रशासनिक, राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है या कहें कि इस ताबड़तोड़ छापे से राज्य की राजनीति में हडकंप मच गया है तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे तो यह आयकर विभाग की रूटीन कार्रवाई है, और यही कहा जा रहा है लेकिन राज्य सरकार जिस तरह से इसका विरोध और प्रतिरोध कर रही है इससे लगता है कि यह बदले की कार्यवाही है और बदलापुर है जिसका मकसद सरकार को अस्थिर करना है। राज्य सरकार को डराना, धमकाना और तोड़ना है और केन्द्र सरकार के इशारे पर यह सब जानबूझकर किया जा रहा है।

इस कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार के द्वारा जहां राज्पपाल को ज्ञापन देकर अपना विरोध दर्ज कराया गया है वहीं सांगठनिक स्तर पर भारी प्रदर्शन कर विरोध दर्ज कराई गई है।
इस कार्रवाई की जो प्रमुख बातें उभर कर सामने आ रही हैं उसमें पहला यह है कि इस कार्रवाई में मुख्यमंत्री के करीबियों को निशाना बनाया गया है। इसका मतलब हैं कि मुख्यमंत्री पर परोक्ष रूप से हमला कर कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

दुसरा यह है कि इस कार्रवाई के द्वारा राज्य सरकार को घेरने की कोशिश की जा रही है ताकि राज्य सरकार बचे कार्यकाल में आक्रामकता के बदले बचाव की मुद्रा में रहकर काम करे।

तीसरा इस कार्रवाई से राज्य सरकार को कमजोर कर आगामी चुनाव के लिए जमीन तैयार की जा रही है और जनता को खास संदेश दिया जा रहा है कि कांग्रेस सरकार चलाने के लिए सक्षम नहीं है।

चौथा संदेश यह है कि केन्द्र सरकार भष्ट्राचार के मुद्दे पर सख्त है और किसी भी स्थिति में भष्ट्राचार को लेकर समझौता नहीं किया जा रहा है और राज्य सरकार किस तरह भष्ट्राचार में लिप्त है, यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

इस कार्रवाई को लेकर और भी कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं और निकाले जा सकते हैं जो आने वाले समय में धीरे-धीरे सामने आएंगे, लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आई है वह यह है कि इस छापे या कार्रवाई से “नौकरशाही, अफसरशाही और राजनीति के मध्य गठजोड़ से भारी भरकम भष्ट्राचार के खेल का पर्दाफाश या खुलासा हुआ है।” यह अपने आप में बहुत बड़ी चिंता की बात है और लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी चुनौती भी है।
अभी तक यह बात सुनने को मिलती थी और जानी-समझी जाती थी कि सरकारों को “पूंजीपति, कारपोरेट घराने, बिजनेस क्लास चलाते हैं।”

90 के दशक से यह बात निकल कर आती रही है कि “बिजनेस क्लास और राजनीति” का गठजोड़ या सांठगांठ जिसे “क्रॉनी केपेटलिज्म” (crony capitalism) कहा जाता है, हमारी सरकारों को चलाते हैं लेकिन अब एक नया खुलासा हुआ है कि सरकारों में अब “नौकरशाही, अफसरशाही और राजनीति का गठजोड़” सबसे बड़ा गठबंधन बन गया है जो सरकारें चला रही हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है और बहुत चिंतनीय भी है कि लोकतंत्र कितना मजाक बन कर रह गया है या लोकतंत्र का किस तरह दिनों दिन मजाक बनाया जा रहा है। सरकारें किस तरह से चलाई जा रही हैं और मतदाताओं के साथ किस तरह का भद्दा मजाक किया जा रहा है। यह बेहद संवेदनशील मसला भी है जिस पर बुद्धिजीविओं, पत्रकारों, समाज वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, मध्यमवर्गीय मतदाताओं को गंभीर पड़ताल करने की भी जरूरत है।

यह आम विमर्श का भी विषय है कि ईश्वर और संविधान का शपथ लेकर किस तरह भष्ट्राचार का खेल खेला जा रहा है। किस तरह से इन तीनों (नौकरशाहों, अफसरों और राजनीतिज्ञों ) का कॉकस (caucus) गैर कानूनी रुप से गैर जरूरी चीजों पर राजनीतिक फंडिग (रुपयों) का इस्तेमाल कर या दुरुपयोग कर सरकार को मजबूत करने के लिए या सरकार बनाने के लिए या सरकार चलाने के लिए करता है या कर रहा है।

आने वाले समय में यह एक बहुत बड़ी चुनौती तो बनेगी ही बल्कि अध्ययन के लिए भी एक बहुत बड़ा विषय बनेगा। अक्सर हमारी सरकारें और राजनीतिक दल चुनाव में, चुनाव के वक्त कहती हैं कि भष्ट्राचार मुक्त सरकार और शासन देंगें ! तो अब क्या यह सम्भव है ? क्या इस तरह की घटनाएं भष्ट्राचार को और मजबूत नहीं कर रही हैं ? शायद अब इस देश में, इस लोकतंत्र में भष्ट्राचार मुक्त शासन या सरकारों की कल्पना करना ही व्यर्थ या हास्यापद या मूर्खतापूर्ण है ?

-डॉ. लखन चौधरी,वरिष्ठ प्राध्यापक, हेमचंद यादव विवि

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