इसी नज्म के साथ छत्तीसगढ़ ने तीन दिनों तक सुना था फैज को

2011 में फैज की बेटी मुनीजा हाशमी  राज्य अतिथि बनकर आई थीं

मशहूर पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की नज्म-‘हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ जिसे हिंदू विरोध ठहराया जा रहा है दुनियाभर के आंदोलनों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है और प्रदर्शन के दौरान आईआईटी कानपुर के छात्रों ने भी फैज की यह नज्म गाई थी।

बता दें कि फैज ने वर्ष 1979 में पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक पर लिखी थी। अपने इस क्रांतिकारी विचारों के कारण फैज को बरसों सलाखों के पीछे बिताने पड़े थे। फैज की मौत के बाद वह नज्म पाकिस्तान में जुल्मी हुकूमत के खिलाफ बगावत और प्रतिरोध का नारा बन गई थी।

इसी दौरान लाहौर के स्टेडियम में पाकिस्तान की मशहूर गजल गायिका इकबाल बानो ने 50 हजार लोगों की मौजूदगी में ‘हम देखेंगे’ नज्म को गाकर इसे अमर कर दिया था। तब से लेकर आज तक इसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के कई गायक अपनी आवाज दे चुके हैं।

अब इसे आईआईटी कानपुर के उपनिदेशक मनिंद्र अग्रवाल ने फैज की इस नज्म को हिंदू विरोधी ठहराया है। आईआईटी ने एक समिति गठित की है, जो यह तय करेगी कि यह नज्म हिंदू विरोधी है या नहीं।

कविता की जिस लाइन पर बवाल मचा वह इस प्रकार है ‘जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी, जब अर्ज़-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएंगे, हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे, सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का’।

सोशल मीडिया अब इसे लेकर उबल पड़ा है। कुछ का कहना है कि अब साहित्यकारों का मूल्यांकन इंजीनियर करेंगे। तो कुछ ने लिखा साहित्यकारों के खिलाफ षडयंत्रें का पुराना इतिहास रहा है।

ट्वीटर पर कश्मीर के इतिहास के शोधार्थी – लेखक अशोक कुमार पांडे ने लिखा है कि प्रेमचंद पर पंडितों ने केस किया कि ब्राह्मणों कि अपमान कर रहे हैं, बाद में दलितों ने दलित विरोधी साबित करने के लिए जान लगा दी। फ़ैज़ को ज़िया उल हक़ ने गिरफ़्तार कराया, इस्लाम विरोधी कहा और अब हिन्दू विरोधी कहा जा रहा है। बड़े और सच्चे रचनाकार से सब डरते हैं।

शोधार्थी इंजीनियर भाष्कर शुक्ला ने इस ट्वीट के जवाब में लिखा है कि जावेद अख़्तर साहब ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब तक दोनों तरफ के कट्टरपंथी आपको बुरा बोल रहे हैं तब तक आप सही रास्ते पर हैं।

अब फैज की खैर नहीं…

छत्तीसगढ़ के भिलाई में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और वोल्गा से शिवनाथ के लेखक मो. जाकिर हुसैन ने जानकारी देते फेसबुक पर लिखा है -जिन फैज की नज्म को लेकर इतना बावेला मचाया जा रहा है,उन फैज पर छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ा कार्यक्रम भारतीय जनता पार्टी की सरकार के डीजीपी विश्वरंजन ने भिलाई में किया था और इसमें शिरकत करने फैज की बेटी मुनीजा हाशमी को राज्य अतिथि बनाकर खास तौर पर बुलाया गया था। क्या यह राज्य की भाजपा सरकार की रजामंदी के बिना मुमकिन था?

वैसे भिलाई के उस प्रोग्राम में इस नज्म के साथ-साथ फैज की कई रचनाएं तीन दिन तक खूब पढ़ी गईं थी। तब शायद देश को इतने खांचों में बांटा नहीं गया था। ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है।

मई 2011 को आयोजित इस अन्तरराष्ट्रीय मुशायरे की सदारत (अध्यक्षता) पाकिस्तान की मशहूर शायरा डॉ. आरिफ़ा सैयदा साहिबा ने की। लाहौर से भिलाई पधारीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की साहबज़ादी डॉ. मुनीज़ा हाश्मी मुख्य अतिथि थीं। मौक़े पर पाकिस्तान के जिओ टीवी के डायरेक्टर अब्दूर रऊफ़ साहब एवं दुर्ग के महापौर डॉ एस के तमेर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

‘अब फैज की भी खैर नहीं’ शीर्षक से पोस्ट करते वे लिखते हैं, “बहुत नेहरू-गांधी कर लिए तो लीजिए अब सदी के बड़े शायर फैज अहमद फैज को भी उनकी कब्रगाह से निकाल लाएं हैं। वो भी ऐसे लोग, जिनकी आईटी सेल का मुखिया पहली लाइन में कहता है मुझे शायरी में दिलचस्पी नहीं है। अब समझना और सम्हलना हम सबको है…”।

बता दें कि हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन, फिराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय) के नाती हैं। जिनके बारे में खुद फैज अहमद फैज ने कहा था कि फिराक साहब से बहस नहीं की जा सकती। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी व फारसी के वह पंडित हैं ही, रशियन व संस्कृत के भी विद्वान हैं।

                                                                                                                                               – डा. निर्मल कुमार साहू

                                                                                                                  (तस्वीर क्रेडिट- युग मानस ब्लाग से साभार)

 

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