सकारात्मक राजनीति का स्वागत हो- डॉ. लखन चौधरी

वर्तमान राजनीति में हेमचंद यादव विवि के वरिष्ठ प्राध्यापक के विचार

 

दिल्ली की आप पार्टी के कामकाज / कार्य निष्पादन से दिल्ली के कुल 86 % (53 % पूर्णतः एवं 33 % कुछ हद तक) लोग संतुष्ट हैं, वहीं दिल्ली के दस मे से 9 लोग यानि कुल 90 % (66 % पूर्णत: एवं 24 % कुछ-कुछ रुप से) लोग केजरीवाल को मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद कर रहे हैं। इसका मतलब है कि केजरीवाल की लोकप्रियता बरकरार है और आगामी चुनाव में दिल्ली में आप पार्टी भारी बहुमत से वापसी कर रही है।

लोकनीति-सीएसडीएस दिल्ली के ताजा सर्वेक्षण के रोचक आंकड़ों से स्पष्ट है कि आप पार्टी एवं केजरीवाल ने पिछ्ले 5 सालों में दिल्ली में, दिल्ली की आम आदमी के लिए काम किया है।

आज दिल्ली का आप पार्टी का विरोधी भी आप पार्टी के शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये गये कामों का प्रशंसक है। शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधाओं में आये या किये गये बदलाव एवं परिवर्तन का स्वागत कर रहा है तो इसका मतलब साफ है कि जनहित में, जनहित के काम हुए हैं।

क्या इस तरह की सकारात्मकता या सकारात्मक प्रतिक्रिया और राजनीति का स्वागत नहीं करना/ होना चाहिए ? क्या आज देश के लिए, देश को इसकी जरूरत नहीं है ? क्या इस तरह की पहल देश के अन्य राज्यों में शिक्षा व्यवस्था एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में गुणात्मक सुधार लाने के लिए नहीं की जा सकती है ?

क्या छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी इस तरह की पहल की जरुरत नहीं है ? जहां शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था बदतर हैं/हो चुके हैं।

छत्तीसगढ़ की सरकार को इसे मिशाल के तौर पर, चुनौती के रुप में लेकर काम करना चाहिए। यदि छत्तीसगढ़ की सरकार इस दिशा में कोई ठोस पहल करती है तो यह बहुत ही सार्थक कदम साबित होगा, सरकार के लिए भी और यहां की आमजनता के लिए भी।

0 क्या राज्य सरकार इस पर विचार करने के लिए तैयार है ?/ होगी ?

0 क्या सरकार के सलाहकार और सरकार के नुमाईंदे इस तरह के सकारात्मक पहल के लिए गंभीर हैं ?

0 क्या यहां के जनप्रतिनिधि इस पर विचार करने की जरुरत अनुभव करते हैं ?

0 क्या यहां के लोगों में इतनी चेतना जागृत की जा सकती है ?

0 क्या यहां का मिडिया इस तरह की सोच को आगे बढ़ा सकता है ?

0 क्या यहां की युवा पीढ़ी इस तरह की विचारधारा से प्रभावित हो सकती है ?

0 यहां पर सवाल यह नहीं है कि क्या हम आप पार्टी की विचारधारा से सहमत हैं ? या असहमत हैं ?

यहां बात केवल काम की है, कामकाज की है, शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की है। इसलिए दलगत राजनीति से बाहर निकल कर/उपर उठकर इस पर गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श करने की जरुरत है।

 

 

 

                                                                                    -डॉ. लखन चौधरी
वरिष्ठ प्राध्यापक, हेमचंद यादव विवि
 

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