बेड़ा और करेर की पहाड़ी, गेहूं, चना व मटर के खेत

दोपहर को पड़ोस के गुरूजी ने कहा- चलो आप को हमारा खेत दिखाने ले चलते हैं। मैंने कहा – चलिए। उस समय घड़ी में दो बज रहे थे। हवा में ठंडक थी। मंद मंद बह रही थी। कुछ ही देर में हम शहर से निकल कर खुली सड़क पर आ गए।

सतपुड़ा के जंगलों में जैसे ही हम घुसे बेड़ा पहाड़ पडा। बेड़ा यानी बिड़ना यानी प्रवेश करना। बाद में हमने बेड़ा को पांच बार क्रास किया मटकुली तक। यही रोड़ पचमढ़ी जाता है।

जंगल के नालों में अभी पानी था, वे बह रहे थे। अब हम छोटे-छोटे चनों के खेतों को देख रहे थे। उनमें मंडा बने थे जिन पर रात में किसान बसेरा कर खेतों की रखवाली करते हैं।

चना फूल पर हैं, यह बिना सिंचाई की खेती हैं पर चना अच्छे हरिया रहे थे। गुलाबी फूल मुझे खींच रहे थे।

अब हम झिरपा गांव पहुंच गए थे। सीधे गेहूं के खेत में गए। खेतों की मेढ़ों पर बड़ी लम्बी घास थी। इसे गुनिया घास कहते हैं और सुकरा (घास) भी बहुत था। सुकरा की नोंक पैनी होती है, जो कपड़ों में चिपक जाती है।

हमने गेहूं के खेत का चक्कर लगाया। मेढ़ों पर कई तरह के पेड़ देखे- जामुन,आम, संतरा, मौसम्बी इत्यादि।

अरहर, मटर, चना के खेत भी देखे। मटर में फलियां आ गई हैं। इस बीच धूप खिली हुई थी। महिला किसान मवेशियों को हरा चारा व घास काटते हुए मिलीं।

खेतों में यहां जंगली जानवरों का प्रकोप है। नील गाय व जंगली सुघर का, इसलिए लोगों ने फेसिंग की है या बागुड़ की है।

खेतों में चिड़ियाएं बहुत थीं। बंदर भी दिखे, घूमते-घूमते देर हो गई। गुरूजी खुद के घर ले आए। चाय पी और छोटे टमाटर, लौकी, तोरई, बल्लर के पौधे देख मन खुश हुआ।

– बाबा मायाराम

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और विकासपरक मुद्दों पर लिखते हैं)