आंकलन का भी वक्त

-डॉ. लखन चौधरी

रायपुर | छत्तीसगढ़ के राज्यपाल महोदया का यह कथन एकदम सही, उचित, सार्थक एवं आज के संदर्भ में अत्यंत ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है कि ‘राज्योत्सव की खुशी मनाने के साथ समीक्षा भी करें कि हम कहां पीछे हैं।’

छत्तीसगढ़ राज्य अपनी स्थापना के दो-दशक पूरा कर रहा है, और इन 19-20 सालों में राज्य में चहुंमुखी विकास हुआ है। लगभग सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य हुये हैं और तेजी से हो रहे हैं, पर यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राज्य की सामाजिक-आर्थिक विकास की तस्वीर यदि निराशाजनक नहीं है तो बहुत अधिक प्रशंसनीय भी नहीं है।

शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था में राज्य में मात्रात्मक विकास एवं सुधार बहुत हुए हैं। अनेकों नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम बनाए गए हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, नौकरशाही की मनमानी,अधिकारियों-कर्मचारियों के भष्ट्राचार और अभिभावकों की अज्ञानता के चलते धरातल पर कोई ठोस परिणाम नहीं है।

राज्य में मानव संसाधन विकास की स्थिति बदतर है। आज छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक इन्हीं दोनों क्षेत्रों में गुणात्मक सुधार लाने के लिए काम करने की निहायत आवश्यकता है। उद्यमवृति बढ़ाने के लिए युवाओं को काबिल बनाए जाने की जरुरत है। तभी सही मायने में राज्य के गठन की संकल्पना साकार हो सकेगी।

नये सरकार पर दबाव बनाने की जरुरत है कि इस दिशा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए प्रयास करे। अन्यथा आने वाले दशक में राज्य में राजनीति को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की भागीदारी एवं भूमिका चिंतनीय हो जाएगी। हमारे प्रदेश की युवा पीढ़ी को इसी असुरक्षा की भावना से निकालने की जरुरत है।

प्रदेश के ग्रामीण और खेतिहर समाज में उद्यमवृति बढ़ाने के साथ-साथ उद्यमशीलता की भावना पैदा करने की जरुरत है। जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे आमजन को गुमराह करने और मुफ्त बांटने की राजनीति छोड़कर लोगों में काबिलियत पैदा करने के लिए काम करें।

सचमुच आज चिंतन, विमर्श और विश्लेषण का समय है, और साहस के साथ कमजोरियों को चिन्हांकित कर ठोस कदम उठाने और जमीनी स्तर पर काम करने की जरुरत है।

(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं)