रायपुर में है श्री कृष्ण की बड़ी बहन का मंदिर, हज़ारो साल पहले हुई थी स्थापना…

यहाँ श्री कृष्ण जन्मोत्सव से पहले मनाया जाता है उनकी बड़ी बहन का प्राकट्योत्सव

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक ऐसा मंदिर है जो भगवान् श्री कृष्ण की बड़ी बहन का है। उनका भी जन्म भगवान् श्री कृष्ण के जन्म से महज़ कुछ घंटे पूर्व हुआ था। श्री कृष्ण जन्मोतस्व के साथ उनका भी प्राकट्योत्सव इस मंदिर में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।
 जन्माष्टमी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के, एक ऐसे ऐतिहासिक मंदिर के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे है, जो भगवान् कृष्ण की बड़ी बहन का मंदिर है। जी बिल्कुल ये मंदिर उनकी बड़ी बहन योगमाया यानी महामाया का है। राजधानी के पुरानी बस्ती स्तिथ महामाया मंदिर में हर साल जन्माष्टमी का पर्व बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। ऐसा इस लिए क्यों की इस दिन माँ महामाया का भी प्राकट्य हुआ था। पुराणों में इस बात ज़िक्र भी मिलता है।
 जन्माष्टमी

द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।

एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उठा। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?’ 

कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।

 

तब भगवान् विष्णु ने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को आठवां पुत्र पैदा हुआ, उससे कुछ समय पूर्व यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो कोई और नहीं माँ महामाया थी।

जब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को उनकी आठवीं संतान प्राप्ति हो चुकी है तब कंस आनन फानन में बंदी गृह पंहुचा। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर ज़मींन में पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’

 जन्माष्टमी

जन्माष्टमी में होता है भव्य श्रृंगार
मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि राजधानी के इस महामाया मंदिर में जन्माष्टमी के पूर्व आज भी राजराजेश्वरी माँ महामाया का दूध दही समेत पंचामृत अभिषेक किया जाता है। जिसके बाद माँ महामाया का भव्य श्रृंगार किया जाता है। जिसके बाद पुरे विधि विधान से माँ महामाया की पूजा अर्चना कर उनकी आरती उतरी जाती है। जिसके बाद मंदिर परिसर में ही भगवान् श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। पंडितों की मानें तो इस दिन माँ महामाया से जो भी मनोकामना की जाती है तो निश्चित ही माँ उसे पूरा करती है।

जगतजननी कहलाई थी महामाया
वैसे तो माँ महामाया ने भगवान् विष्णु के कहंने पर देवकी की कोख से जन्म लेकर कंस को उसकी मृत्यु का सन्देश दिया था। इस सन्देश के साथ ही माँ महामाया के अदृश्य होने के बाद भगवान् विष्णु ने उन्हें जगतजननी के नाम से पुकार कर उन्हें विभिन्न स्थानों में स्थापित हो वैश्विक कल्याण के साथ विश्व की संरचना पूर्ण करने कहा था। तब से लेकर आज तक माँ महामाया का मंदिर विभिन्न स्वरूपों के साथ देशभर में स्थापित है।

 

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