महाष्टमी : 700 मंत्रों के साथ महामाया मंदिर में हवन की प्रक्रिया हुई शुरू

हवन के बाद कल नवमी तिथि में महामाया मंदिर में देवियों का होगा वीर मुद्रा में श्रृंगार

रायपुर। महा अष्टमी में आज प्रातः काल से ही श्रद्धालुओं द्वारा अठवाही (रोठ, पूडी, खीर व मिठाइ) चढाने की प्रकिया आरंभ हो चुुका है। नित्‍य दिनचर्या वाले आरती स्तुति आदि क्रिया कलाप के बाद अष्‍टमी हवन भी शुरू हो चुका है। पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि सुबह 9 बजे से प्रधान ज्योति कक्ष में हवन के लिये पूजन किया जा रहा है , पश्चात ऐतिहासिक हवन कुंड में हवन के लिये कुशकुण्डिका ,अग्नि आवाहन पूजन किया जायेगा।
( परिसर में उपस्थित छोटी कन्या की पूजा कर उनके हाथ से ही अग्नि आवाहन किया जाता है ) फिर पूजन कर आवाहित देवताओं के नाम से आहुति दी जाती है। इसके बाद शक्ति आराधना के महाग्रन्थ श्रीदुर्गासप्तशती जी के 700 मंत्रों द्वारा आहुति दी जाती है।

13 अध्याय के मंत्रों से हवन पश्चात परिसर में प्रतिष्ठित माँ समलेश्वरी देवी मंदिर के हवन कुंड में अग्नि स्थापना पूजा कर 1 माला मंत्रों से आहुति दी जाती है। दिक्पाल पूजन किया जाता है। पुनः महामाया मन्दिर वाले हवन कुंड में दिक्पाल बलि, नवग्रह बलि , क्षेत्रपाल बलि कर पूर्णाहुति की जाती है। मन्दिर ट्रष्ट द्वारा प्राचीन परम्परा का निर्वहन करते हुए नारियल द्वारा पूर्णाहुति की जाती है। लेकिन किसी भी श्रद्धालु दर्शनार्थियों को हवन कुंड में नारियल नही डालना चाहिए। महामाया मन्दिर में हवन आरम्भ अष्टमी तिथि में तथा पूर्णाहुति नवमी तिथि में किया जाता है। इस तरह लगभग 3 – 4 घण्टे की पूजन हवन पश्चात पूर्णाहुति दोपहर को 1 बजे के बाद सम्पन्न होगा। फिर महाआरती के बाद आवाहित देवी देवताओ की मन्त्रयुक्त विसर्जन पूजन कर ब्राह्मण भोजन कराया जायेगा। तथा यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है।

अलग है ज्योति विसर्जन के नियम

ज्योति विसर्जन हवन पूर्णाहुति के बाद आने वाली रात्रि में , अर्धरात्रि के समय राजज्‍योति सहित समस्‍त मनोकामना ज्‍योति का विसर्जन किया जाता है ।
मध्‍यरात्रि के समय विसर्जन शुरु करने से पूर्व मंदिर परिसर के सभी लोग को मंदिर परिसर से बाहर निकाला जाता है। क्‍योंकि ऐसी पुरानी परंपरा है कि ज्‍योति विसर्जन को कोइ नहीं देख सकता । दरवाजे पर सुरक्षा गार्ड की डयुटी लगा दिया जाता है कि कोइ भी परिसर में ना आ सके। परिसर में केवल पुजारी तथा ज्‍योति रखवाली कर रहे पंडागण (जो विसर्जन कार्यक्रम में सहयोग मात्र करते हैं) ही रहते है । तब ज्‍योति विसर्जन पूर्व गर्भगृह में मातेश्‍वरी के सामने शस्‍त्र पूजा की जाती है । जिसमें मातेश्‍वरी की आठों हाथों में धारण किये जाने वाली सभी शस्‍त्रों (धनुष बाण, तलवार,चक्र,गदा,परिध,शूल,भुशूंडी) की विधि पूर्वक पूजन कर कुष्‍माण्‍ड बलि (राखिया) दिया जाता है । शस्‍त्र पूजा व बलि के बाद राजज्‍योति की विसर्जन पूजा कर मंदिर परिसर स्थित प्राचीन बावली में ही विसर्जित किया जाता है।

वीर मुद्रा में होगा श्रृंगार

पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि ज्‍योति विसर्जन के बाद मातेश्‍वरी की ‘’वीर मुद्रा’’ में भव्‍य शस्‍त्र श्रृंगार किया जाता है । पूरे आठों हाथों में शस्‍त्र धारण के साथ ही आर्कषक श्रृंगार किया जाता हैं। यह शस्त्र सिंगार पुरे वर्ष भर में मात्र 2 बार ही , नवरात्रि पर्व के नवमी तिथि को ही किया जाता है। इस दुर्लभ दर्शन के लिये दूर दूर से श्रद्धालु गण माँ महामाया के दरबार में आते है। 7 अक्टूबर सोमवार को मन्दिर समय मे दिनभर इस दुर्लभ छवि का दर्शन किया जा सकता है।