रक्षाबंधन : जब रक्षासूत्र की रक्षा के हुमायूं ने डाली थी तलवार

भारतीय इतिहास से जुड़े है रक्षाबंधन के कई क़िस्से

 

रायपुर। रक्षाबंधन का त्यौहार पौराणिक काल से मनाया जा रहा है। प्राचीन समय में राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे। तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में रेशमी धागा बांधती थी। इस विश्वास के साथ किए जा कर उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आएगा।

रक्षाबंधन raakhi

राखी के साथ ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। मुगल काल के दौर में जब मुगल बादशाह हुमायूं चित्तौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा। तो राणा सांगा की विधवा कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा का वचन ले लिया। हुमायू ने भी इसे स्वीकार करके चित्तौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया। जिसके बाद मुसलमान होते हुए भी, राखी की लाज निभाने के लिए, चित्तौड़ की रक्षा के लिए, बहादुर शाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए, कर्मावती और मेवाड़ की रक्षा की थी।

ऐसा ही कुछ सिकंदर के साथ भी हुआ। सिकंदर की पत्नी ने, अपने पति के हिंदू शत्रु पूर्वज को राखी बांधकर, अपना मुंह बोला भाई बनाया। और युद्ध के समय सिकंदर को ना मारने का वचन लिया। युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

ये है हिन्दू पुराणों में महत्त्व
रक्षाबंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है। वामनावतार नामक पौराणिक कथा में रक्षाबंधन का एक अनोखा प्रसंग मिलता है। एक बार राजा इन्द्र की राक्षसों से युद्ध छिड़ गया। ये युद्ध कई दिनों तक चलता ही रहा। इसमें न राक्षस हार मानते थे, न इन्द्र जीतते दिखाई देते थे। इन्द्र बड़ी सोच में पड़ गए। वह अपने गुरु बृहस्पति के पास आकर बोले, ‘गुरुदेव, इन राक्षसों से मैं न जीत सकता हूं न हार सकता हूं। न मैं उनके सामने ठहर सकता हूं, न भाग सकता हूं।

Lord indra Indrani रक्षाबंधन

इसलिए मैं आपसे अंतिम बार आशीर्वाद लेने आया हूं। गर अबकी बार भी मैं उन्हें हरा न सका तो युद्ध में लड़ते- लड़ते वहीं प्राण दे दूंगा। उस समय इन्द्राणी भी पास बैठी हुई थीं। इन्द्र को घबराया हुआ देखकर इन्द्राणी बोलीं, ‘पतिदेव, मैं ऐसा उपाय बताती हूं जिससे इस बार आप अवश्य लडाई में जीतकर आएंगे। इसके बाद इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र पढ़कर इन्द्र के दाहिने हाथ में एक धागा बांध दिया और कहा, पतिदेव यह रक्षाबंधन मैं आपके हाथ में बांधती हूं. आप इस रक्षा-सूत्र को पहन कर एक बार फिर युद्ध में जाएं। इस बार अवश्य ही आपकी विजय होगी। और ऐसा ही हुआ इन्द्र जोर-शोर से लड़ने लगे। और आखि़र में इन्द्र की विजय हुई। मान्यता है कि तब से ही रक्षाबंधन का त्यौहार शुरू हुआ।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.